गीत - जसवीर सिंह हलधर

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चार दिन की चाँदनी है इन अँधेरों के सफर में ।
लौट आए फिर अभागे हंस बगुलों के शहर में ।।

रह गए पीछे कहीं जो साथ चलते थे हमेशा ।
देख कर ऊंची उड़ानें हाथ मलते थे हमेशा ।
पंख घायल हो गए हैं कील किरचों की डगर में ।।
लौट आए फिर अभागे हंस बगुलों के शहर में ।।1

मोतियों वाले सपन अब आ रहे हैं याद उनको ।
कीट गंदे नीर वाले कर रहे बरवाद उनको ।
सीपियों की कोख बंजर हो गयी है सिंधु घर में ।।
लौट आए फिर अभागे हंस बगुलों के शहर में ।।2

साथ बगुलों के निभाना भाग्य में ऐसा लिखा था ।
चुग गया मोती हमारे आज हमको वो दिखा था ।
चुभ रहे कांटे अभी तक मछलियों के अंतसर में ।।
लौट आए फिर अभागे हंस बगुलों के शहर में ।।3

जिंदगी की तल छटी पर सूखती सी काइयां हैं ।
रात में कुछ खोजती सी घूमती परछाइयां हैं ।
गीत "हलधर "लिख गए हैं भाव की बहती लहर में ।।
लौट आए फिर अभागे हंस बगुलों के शहर में ।।4
- जसवीर सिंह हलधर , देहरादून 
 

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