गीत - झरना माथुर 

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सजना जी रूठे है कैसे समझाऊं,
ये प्रीत की उलझन में कैसे सुलझाऊं,
आगे पीछे घूमू  कुछ सूझत नाही,
अब मन ही मन में उनसे घबराऊ।

 होठों पर नाना है मन में है हां हां,
आंखों ही आंखों में बुनते ताना-बाना,
बिखरे बालों में है कुछ तो राज उनका,
कैसे समझू मुझको आए शर्माना।

बाहों में उनकी है मस्ती के घेरे,
मैं उनकी सजनी वो साजन है मेरे,
उनसे मेरा जन्मों का जैसे नाता,
उनके संग रिश्ते हैं मेरे ये गहरे।
- झरना माथुर, देहरादून
 

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