गीतिका (वृहद प्रश्न) -- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

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नई राह हमको बताती है क्या क्या।
चलें कंटकों बिन सिखाती है क्या क्या।1

प्रकृति के कई रंग दिखते सभी को,
निराले स्वरों में सुनाती है क्या क्या।2

नदी तोड़ तटबन्ध बहती कभी जो,
बहा कर किनारे लगाती है क्या क्या।3

न औकात में आदमी यदि रहे तो,
धरा रूप अपने दिखाती है क्या क्या।4

कभी बाढ़, सूखा पड़े अब अचानक,
कभी अग्नि बन वो जताती है क्या क्या।5

भयानक लहर सिंधु में उठ रहीं अब,
सुनामी कहर आज ढाती है क्या क्या।6

बदल जा मनुज अब समय की कमी है,
बचा देखना और है आज क्या क्या।7
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश
 

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