गीतिका - मधु शुक्ला 

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है यही अरमान अपना प्रेम का विस्तार हो,
जाति मजहब की नहीं संबंध में दीवार हो।

एकता के सूत्र में बंध कर रहें सब नागरिक,
देश हित गौरव हमें हर शर्त पर स्वीकार हो।

देश का झंडा हमें प्रिय जान से ज्यादा लगे,
हर घड़ी मन हेतु इसके त्याग को तैयार हो।

हो अगर अरमान पूरा लोग मिल कर के रहें,
प्यार हमदर्दी भरा तब यह सकल संसार हो।

क्रूरता का अंत हो संवेदनाएं जन्म लें,
'मधु' तभी प्रचलित जगत में साम्यता व्यवहार हो।
 — मधु शुक्ला, सतना , मध्यप्रदेश
 

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