ग़ज़ल (हिंदी) - जसवीर सिंह हलधर 

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जरा सी बात पर महफूज घर भी टूट जाते हैं ।
बुरे हालात में मजबूत नर भी टूट जाते हैं ।

जड़ें सहयोग करना बंद कर देती तने का जब,
उठे तूफान में ऊँचे शजर भी टूट जाते हैं ।

हकीकत जानना चाहो चमन में झांक कर देखो ,
गुलों की चाह में भंवरों के पर भी टूट जाते हैं ।

हमें मालूम है उसने बहुत भूचाल झेले हैं ,
मरम्मत के बिना दीवारो दर भी टूट जाते हैं ।

किताबों में लिखा है जीत होती है सदा सच की ,
अदालत की बहस में ये असर भी टूट जाते हैं ।

गलत फहमी अगर ले ले जन्म दाम्पत्य जीवन में ,
किये पावक के सम्मुख सात वर भी टूट जाते हैं ।

अगर है डोर कच्ची आपसी संबंध रिश्तों की ,
सगी औलाद के झगड़ों में कर भी टूट जाते हैं ।

जरूरत से अधिक सम्मान करना चापलूसी है ,
झुकाने से अधिक कंधे व गर भी टूट जाते हैं ।

किसानी या जमे व्यापार में यदि हानि हो"हलधर" ,
अगर भी टूट जाते हैं मगर भी टूट जाते हैं ।
-जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
 

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