ग़ज़ल - अनिरुद्ध कुमार

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जिंदगी चार दिन की कहानी है,
आदमी हीं जहाँ की निशानी है। .

सिर्फ  बचपन ज़वानी बुढ़ापा है,
गीत सबको यहीं गुनगुनानी है। 

जान ले आदमी इक खिलौना है,
हर घड़ी खेल अपनी दिखानी है। 

सोंचते क्या परेशान होना क्या।
बस नसीबा यहीं आजमानी है। 

जा रहा कांरवा ढूंढते मंजिल,
आदमी को हुनर भी दिखानी है। 

जी रहें हैं सभी बोलना अब क्या,
कह रहे सब यही जिंदगानी है।

देख 'अनि' क्या कहे राह अंजानी,
हाय दुनिया इसी की दिवानी  है।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

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