ग़ज़ल - कलिका प्रसाद 

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ख़ुशी और गम की सदा जिन्दगी,
चंद साँसों का सिलसिला जिन्दगी।

कदम दर कदम हादसा है जिन्दगी,
जाने किस जुर्म की सज़ा जिन्दगी।

ज़ुल्म की कर नई  इंतेहा तू मगर,
हमको तुझसे नहीं गिला जिन्दगी।

एक ठोकर से मिस्मार  ये हो गई,
कितना नाजुक आइना है ज़िंदगी।

हम  रोज़  मर -मर के जीते रहें,
क्या यही है तेरा फ़ैसला है जिन्दगी।

साथ छोड़ेगी और बिछड़ जाएगी,
कितनी   बेवफ़ा  है  ये  ज़िंदगी।

हमको जीने दे कुछ पल चैन से,
ख़ाक में अभी न मिला जिन्दगी।

तुझ पर बहुत  नाज़ है  मुझे ,
देख  ज़रा हौसला  बड़ा ज़िंदगी।

- कालिका प्रसाद सेमवाल
मानस सदन अपर बाजार
रुद्रप्रयाग  उत्तराखंड
 

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