ग़ज़ल - विनोद निराश

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आज कल नज़रे चुरा रहा है,
याद पल - पल आ रहा है। 

आशना रहा मुद्दतों हमसे, 
जाने क्यूँ गैर बता रहा है। 

कल तक तो करीब था पर,  
आज बेरुखी दिखा रहा है। 

हो कर गैर से मुखातिब वो, 
रिश्ता-ए-वफ़ा निभा रहा है। 

बिछुड़ने का गम नहीं मगर,
इश्क़े-यार अब रुला रहा है।  

इतने जुल्मों-सितम के बाद, 
जाने क्यूँ वही भा रहा है। 

लाख कोशिशे की भूल जाऊं,  
पर निराश को लुभा रहा है। 
- विनोद निराश , देहरादून

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