हिंदी ग़ज़ल -  जसवीर सिंह हलधर 

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मछेरे  वही  हैं  वही  जाल भाई !
वही मछलियाँ हैं वही ताल भाई !

गधे खा रहे माल मीठा मलाई ,
नहीं अश्व के पैर में नाल भाई !

लगी होड सी है खिंचाने की फोटो ,
जलें भूख की आग से चाल भाई !

अमीरी गरीबी पे भारी पड़ी है  ,
न रोटी न चावल नहीं दाल भाई !

कभी लॉकडाउन बना था तमासा,
करोना बना था तभी काल भाई !

दवा की दुकानें सभी खुल रहीं थी ,
शराबी दिखें थे बुरे हाल  भाई !

सड़ी खेत में अन्न सब्जी हमारी ,
धरा पूत रोये नहीं ढाल भाई !

बटी कौम भोली कमीनी सियासत ,
बजाती जमातें फिरें गाल  भाई !

यहाँ भूख से कौन हारा नहीं है ,
इसी ने झुकाया सदा भाल भाई ।

दिखा झोंपड़ी में गरीबी नजारा  ,
पड़ा कोठियों में बहुत माल भाई ।

कहीं पेड़ की कोई कीमत न "हलधर",
कहीं बिक रही तोल में छाल भाई ।
- जसवीर सिंह हलधर, देहरादून 
 

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