हिंदी ग़ज़ल - जसवीर सिंह हलधर 

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जनवरी को जून बतलाने लगे हैं आजकल ।
भाषणों में खूब चिल्लाने लगे हैं आजकल ।

फिर चुनावों के लिए तैयारियां हैं जोर से ,
जोड़ने को देश वो छाने लगे हैं आजकल ।

राजनैतिक धर्म इतना गिर चुका है साथियों ,
हक गरीबों का यहां खाने लगे हैं आजकल ।

चैनलों पर मज़हबी चौपाल अब सजने लगीं ,
मौलवी अलगाव उकसाने लगे हैं आजकल ।

गाय राजस्थान की ये सोचकर हैरान हैं ,
आदमी क्यों देख कतराने लगे हैं आजकल ।

मछलियों में खलबली ये देखकर दरियाब में ,
युद्ध के अभ्यास धमकाने लगे हैं आजकल ।

लुप्त चीते की नसल आयात होकर आ रही ,
मेमने , मृग झुंड घबराने लगे हैं आजकल ।

भर्तियों का देख "हलधर" हाल उत्तराखंड में ,
घाटियों में फूल कुम्हलाने लगे हैं आजकल ।
- जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
 

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