हिंदी ग़ज़ल - जसवीर सिंह हलधर

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रोज़गारी के लिए ठंडी हवा आई तो है ।
देश के माहौल में थोड़ी सी तरुणाई तो है ।

एक तीखी आँच मेरे मुल्क को छूने लगी ,
बात छोटी सी नहीं मुद्दे में गहराई तो है ।

भाषणों से आपके सब ठीक  है ये लग रहा ,
और तो सब ठीक है पर मज़हबी खाई तो है ।

पेड़ पौधे फूल कलियां क्यों यहां बेचैन हैं ,
बाग की आबोहवा में तल्ख़ रुसवाई तो है ।

साठ सालों का तजुर्बा है हमें भी मुल्क का ,
योजनाएं ठीक हैं पर खूब  मंहगाई तो है ।

अब हजारों साल के इतिहास में मत झाँकना ,
ठीक हैं आलेख पर उनमें तुरपाई तो है ।

शीश धुनते फिर रहे हैं लोग उसके काम पर ,
आप मानो या न मानो उसमें चतुराई तो है ।

सामने अख़बार देखा हाल जाना विश्व का ,
पश्चिमी परिवेश पर हावी ये पुरवाई तो है ।

चाय पीते चुश्कियों में कह गया पूरी ग़ज़ल,
शे'र "हलधर" तल्ख़ हैं दुष्यंत परछाई तो है ।
- जसवीर सिंह हलधर, देहरादून  
 

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