कविता -  जसवीर सिंह हलधर 

pic

मेरी बात करो मत भैया , तुम अपना घरवार सँभालो ।
मैं तो खतरे से बाहर हूँ , तुम अपना संसार सँभालो ।।

संघ राज्य बतलाते मुझको, नाम राष्ट्र का क्या दे पाये ।
अब भी मुझमें छिपे पड़े हैं , ब्रिटिश कानूनों के साये ।
लोकतंत्र की मैं हूँ झांकी , जान अभी हैं मुझमें बाकी ,
मेरी नीव खोदने वालों , तुम अपनी दीवार सँभालो ।।
मेरी बात करो मत भैया ,तुम अपना घरवार सँभालो ।।1

जब भी पाया तुमने मौका , देते आये मुझको धोखा ।
सौ से ज्यादा घाव दिए हैं ,संसद में सब लेखा जोखा ।
दस वर्षों का था आरक्षण ,कौन कर रहा इसका रक्षण ,
मेरे रोग गिनाओं मत तुम, रोगों का उपचार सँभालो ।।
मैं तो खतरे से बाहर हूँ , तुम अपना संसार सँभालो ।।2

तुम बैठे हो घात लगाए , मिल कैसे सरकार गिरायें ।
अपने अपने युवराजों को , गद्दी का हकदार बनायें ।
जाति धर्म हथियार बने हैं , छाती पर गद्दार तने हैं ,
मेरी घायल देह न देखो,  अपने राजकुमार सँभालो ।।
मेरी बात करो मत भैया , तुम अपना घरवार सँभालो ।।3

मुझको धर्म हीन बतलाकर , किसने मैं निरपेक्ष बनाया ।
बिना आत्मा के क्या कोई , जीवित रह सकती है काया ।
जिस दल ने भी मौका पाया , उसने पूरा लाभ उठाया ,
जर्जर नाव कहो मत "हलधर" खुद अपनी पतवार सँभालो ।।
मैं तो खतरे से बाहर हूँ , तुम अपना संसार सँभालो ।।4।।
- जसवीर सिंह हलधर , देहरादून 
 

Share this story