कविता - मधु शुक्ला

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नया साल लाया मनोहर सबेरा,
नवल रश्मियों ने उजाला बिखेरा।

जगी आस मन में प्रगति हम करेंगे,
वतन हेतु मिल कर हमेशा रहेंगे।

न झगड़ें, सभी धर्म सम्मान पायें,
हमारा वतन ईश ऐसा बनायें।

बहू, बेटियाँ  और  बहनें  हमारीं,
नहीं अब कहायें यहाँ पर बिचारीं।

गरीबी  मिटेगी  वतन  से  हमारे,
दिखेंगे  न  अब भेद वाले नजारे।

हँसे हर सदन, द्वार स्वर्णिम सबेरा,
तभी  चैन  सुख  का रहेगा बसेरा।।
— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश 
 

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