श्रमिक - अनिरुद्ध कुमार

pic

श्रमिक जगत से पूछता, जीवन क्यों बेहाल।
खटते खटते यह मरें, मालिक मालामाल।१।

महल अटारी नित गढ़ें,ठेकेदार का नाम।
श्रमिक निहारें सरजमीं, मिले न पूरा दाम।२।

रात दिन मेहनत करें, दुनिया ठोके ताल।
यह भी कोई जिंदगी, देख लगे कंगाल।३।

कठिनाई में यह सदा, रहता नित मजबूर।
लोग पुकारे शान से, नाम धरें मजदूर।४।

क्या जाने किस पाप का, भोग रहा अंजाम।
कौन इसे है पूछता, सबका अलग कलाम।५।

मजबूरी में आज यह, दीन हीन बदनाम।
कोई ना सुधि लेत है, जीना हुआ हराम।६।

श्रमिक रीढ़ सब बोलते, यह जीवन संग्राम।
श्रमिक दिवस की धूम है, इनको लाल सलाम।७।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

Share this story