मकरसंक्रांति - भूपेन्द्र राघव

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सूर्य   रश्मियाँ  उतर   रहीं  हैं 
सतरंगी      परिधानों     में । 
भीनी   खुशबू  महक  उठी है 
खेतों    में,  खलिहानों   में ॥ 

ओंसकणों से शलभ तितलियां 
हाथ   पैर  मुँह  धो  आये । 
नीड छोड़ कर निकल चुके हैं 
पंछी   भी  आसमानों  में ॥ 

नदियों की सुरमय कलकल ने 
धरती  को  गीत  सुनाया है ।
कलियों  की  अंगड़ाई  से वो
अलिदल भी  खिंच आया है ॥

देवालयों  में  गुंजित  स्वर से 
ईष्टदेव   का   वंदन    है ।
मित्र  आपका  उत्तरायण  में  
शुभप्रभात   अभिनन्दन  है ॥
- भूपेन्द्र राघव, खुर्जा , उत्तर प्रदेश 
 

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