मुक्तक प्रभाती - कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

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"नदी के रूप"
हिम से निकली एक धार को, पर्वत चीर निकलते देखा।
छोटी-छोटी धाराओं से, रूप नदी का बनते देखा।
यौवन पर आई नदिया बन, हो उन्मत्त बहा करती,
प्रौढ़ बनी जो धीमे बहती, उसको रूप बदलते देखा।
"विषधर"
काम हमेशा वही करें हम, जो लगता हो सबसे हट कर।
भाव यही रहता है मन में, पायें खुशियाँ सारे भर-भर।
लक्ष्य प्राप्ति हित भले करें हम, यत्न अनूठे प्रतिदिन मिलकर।
राह शिखर की सदा रोकते, तरह-तरह के कितने विषधर।।
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश 

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