बहुआयामी वात्सल्य दोहे - महावीर उत्तरांचली 

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सब अभिभावक चाहते, घर में श्रवण कुमार,
रात-दिवस सेवा करे, जब-जब हों बीमार //1.//

अपनाये संस्कार तो, भूलो मत इन्सान,
जन्म मिले माँ बाप से, ऋणी रहे सन्तान //2.//

त्यागा पुत्र वियोग में, पिता ने जब शरीर,
छलनी गहरे कर गया, लगा राम को तीर //3.//

धृतराष्ट्र बनो तुम नहीं, त्याग दो पुत्रमोह,
वरना होगा झेलना, इक दिन पुत्र बिछोह //4.//

अवगुण में दुत्कारना, भूल गए हैं लोग,
इसी लिए सन्तान में, आया है हठयोग //5.//

माँ की वो ममता रही, और पिता का प्यार,
दोनों से मिलता रहा, हरदम प्यार-दुलार //6.//

बरसी है हरदम यहाँ, सदा नेह की धूप,
मात-पिता ने विश्व को, दिया प्रेम का रूप //7.//

मात-पिता को मानिये, रब का ही अवतार,
मोल न कोई कर सके, इतने हैं उपकार //8.//

बच्चे बिलखें भूख से, पिता रहा है काँप,
डसने को आतुर खड़ा, महंगाई का साँप //9.//

महंगाई के प्रेत ने, किया लाल को मौन
मात-पिता हैरान हैं, उनको पूछे कौन //10.//
 - महावीर उत्तरांचली, पर्यटन विहार  
वसुंधरा एन्क्लेव , दिल्ली – 110096
 

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