रूबी गुप्ता की कविताओं में मीरा की आंखों का पानी दिखता है - नरेंद्र गौड़

pic

Utkarshexpress.com, कुशीनगर (उ०प्र०)-  रूबी गुप्ता की आसान कविताएं पाठकों को सहज प्रभावित करती हैं।  दुरूह तथा कठिन शब्दों के बिना भी कविता हो सकती है, इस बात को रूबी की कविताएं पढ़कर जाना जा सकता है। इनकी कविताओं के विषय विविध हैं और अनेक बार यह अनौपचारिक रूप से घरेलु और नितांत अंतरंग भी हो सकते हैं कि आश्चर्य होता है यहां भी कविता अपना रूप ग्रहण कर सकती है।
उत्तरप्रदेश के कुशीनगर जिले के दुदही निवासी रूबी  बेसिक शिक्षा परिषद में प्रधान अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं और उल्लेखनीय है कि अपनी नौकरी तथा घर परिवार की थका देने वाली जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए भी सार्थक लेखन कर रही हैं। आप आधुनिक अतुकांत कविताओं के अलावा गीत, गजल तथा लघु कथाएं भी लिखती हैं। अपने गीतों को सुमधुर स्वरों में प्रस्तुत करने की वजह से रूबी की श्रोताओं में खासी लोकप्रियता है। इनका कहना है कि लोक साहित्य में अभिरूचि और उसके प्रति सम्मोहन इनकी रचनाओं में देखा जा सकता है जिसकी प्रेरणा इन्हें अपनी मां श्रीमती रमादेवी से मिली है। एक सवाल के जवाब में रूबी ने बताया कि अभी उनका स्वतंत्र कविता संकलन प्रकाशित नहीं हुआ है जिसके पीछे वह अपनी व्यस्तताओं को प्रमुख कारण बताती हैं, लेकिन ’अनुभूति’ नाम से एक साझा कविता संकलन अवश्य प्रकाशित तथा चर्चित हुआ है, जिसमें रूबी की चुनिंदा कविताएं शामिल हैं। इसके अलावा ’सोमालोब’ तथा ’ दो टूक जिंदगी’ नाम से दो और साझा कविता संकलन हैं, उनमें भी इनकी कविताएं प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं।
सामाजिक तथा पारिवारिक जीवन के अनेक चित्र इनकी लघुकथाओं में भी देखे जा सकते हैं, जिनमें आम आदमी की तकलीफ उजागर है। एक घरेलु महिला को घर परिवार सम्भालने में किन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, उस व्यथा कथा को भी इन्होंने शिद्दत के साथ सरल शब्दों में सामने लाने का सफल प्रयास किया है। एक जगह वह अपनी कविता में लिखती हैं कि उन्हें व्याकरण, छंद और लय का ज्ञान नहीं है और वह दिल की रवानी से साहित्य रचना करती हैं। जो कुछ भी उनके दिलो दीमाग में घट रहा होता है, बस उसी को भाषा देने का प्रयास करती हैं। उनका कहना है कि वह कोई साहित्यकार नहीं हैं और न कवयित्री हैं, बल्कि एक साधारण, लेकिन संवेदनशील प्राणी हैं। ’मेरी अनुभूतियां’ नामक एक दिलचस्प कविता में इन्होंने स्वयं की रचनाशीलता पर वक्तव्य दिया हैं। जिसमें आगे वे कहती हैं कि वह भवभूति की ह्दयचाप हैं और कभी कवि जयशंकर की ’कामायनी’ हैं और कभी बिना लिखे कबीर की बानी भी हैं। इनका कहना है कि वह मीरा की आंखों का पानी लिखती हैं। निश्चय ही एक कवि की यह सर्वोत्तम आकांक्षा होती है कि वह अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों के पदचिंहों पर चलते हुए समाज को दिशा दे। निश्चय ही रूबी एक दिन अवश्य अपने प्रयास में सफल होंगी, ऐसी कामना है। साथ ही उनकी रचनाओं का स्वतंत्र कविता संकलन भी जल्द पढ़ने का मिलेगा। - (समीक्षक - नरेंद्र गौड़, रतलाम मध्यप्रदेश)

Share this story