ध्वनि प्रदूषण (मुक्तक) - कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

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नित्य प्रदूषण ध्वनि का बढ़ता, गांव-गांव सँग शहर-शहर।
ध्वनि-विस्तारक यंत्र ढा रहे, कानों पर अब नित्य कहर।
नहीं ध्यान औरों का रखते, वृद्ध-बाल या रोगी का,
पहले डीजे अंदर बजते, अब दिखते हैं डगर-डगर।
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भारत के गाँवों-शहरों में, वाहन शोर मचाते हैं।
और कहीं जेनरेटर-थ्रेशर, ध्वनि अपनी फैलाते हैं।
कहीं ट्रेन चीखें-चिघ्घाड़ें, कहीं हॉर्न तीखे बजते,
वायुयान जब भी उड़ते तब, नभमंडल दहलाते हैं।
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश 

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