बालगीत (सूरज दादा) - अनिरुद्ध कुमार 

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         सूरज दादा ताप हरो ना।
         बच्चों को बेहाल करो ना।।
गरमी से दूभर अब जीना,
व्याकुलता में चैन कहीं ना।
क्यों इतना तेजी में रहते,
बच्चों का हर सुख है छीना।
          सूरज दादा ताप हरो ना।
          बच्चों को बेहाल करो ना।।
बाहर आना जाना सपना,
कैदी सा जीवन है अपना।
भोरे से क्यों क्रोधित रहते,
भूलें परिंदें सा चहकना।
          सूरज दादा ताप हरो ना।
          बच्चों को बेहाल करो ना।।
सोंचो हम बालक है अदना,
भाये ना  बंधन में रहना।
कर जोड़े मिल करें चिरौरी,
प्रेम रूप दिखलाओ अपना। 
           सूरज दादा ताप हरो ना।
           बच्चों को बेहाल करो ना।।
संगी साथी छूटा गपना,
गुल्ली डंडा निसदिन रटना।
उधम चौकड़ी डोला पाती, 
जीवन नीरस लगता अपना।
           सूरज दादा ताप हरो ना।
           बच्चों को बेहाल करो ना।।
बहुत हुआ अब कृपा करो ना,
गरमी थोड़ा नरम करो ना।
हम बालक खेले मुस्काये,
क्रोधित ना हो धीर धरो ना।
                सूरज दादा ताप हरो ना।
                बच्चों को बेहाल करो ना।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड

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