पावस खलता है.... अनुराधा पाण्डेय 

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जब नर्तकी रूप धरे धरती
प्रिय! पावस का आह्वान करे
घनघोर घटा नभ बीच घिरे
गा गा कर बूँद छटा बिखरे।
ऐसे में पावस खलता है....
तब स्वप्न जिया में पलता है.....

जब शांत सजग हो शाखा पर
प्रिय! कोयल मृदु स्वर गान करे।
जब स्निग्ध सरोवर में सजनी,
निर्मल कोमल जलजात खिले.
अधरों पर उठते गीतों से,
पीड़ा का पर्वत गलता है....
तब स्वप्न हिया में पलता है.....

जब सुरभित गंध समीरण से
अन्तस् में मृदु अनुराग पले
तब पीर भरी प्यासी अँखिया
प्रिय! नित- नित तेरी राह तके।
अवनी पर चातक सी सजनी,
प्यासा मन दहता रहता है
तब स्वप्न हिया में पलता है.....

जब अम्बर पर काली बदरी
रवि-रथ को पिय भरमाती है
 नित यादों की फिर कृष्ण अमा
रह-रह कर मुझे डराती है।
ऐसे में मेरे साथ पिया...
आशा का दीपक जलता है
तब स्वप्न हिया में पलता है....
 - अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका , दिल्ली  
 

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