प्रवीण प्रभाती - कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

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दिनकर का भी तेज साँझ को, ढलने लगता है।
खग-पशुओं का दल तब वापस, चलने लगता हैं।
रवि के ओझल हो जाने पर, तिमिर राज करता,
अंधकार का कोप धरा पर, खलने लगता है।

कल्पना में हर किसी को मात्र धन ही चाहिए।
यूँ दिवास्वप्नों में पड़ कर जिंदगी न बिताइए।
इन छलावों में फँसे तो हाथ कुछ हासिल न हो,
खोल आँखें ढृढ़ कदम से लक्ष्य को पा जाइए।।
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश
 

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