प्रेमिल सावन - विनोद निराश 

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जब भी बरसता सावन आता है,
प्रेमिल सावन के आते ही,
अतीत में खो जाता है मन मेरा,
अशेष स्मृतियाँ मष्तिष्क पटल पर छा जाती है। 

बहुत कुछ याद आता है ,
जब रोज सावन झिर-झिर बरसता है, 
प्रणय की मौन पिपासा की उन्मुक्तता देख,
उद्वेलित उरअंतस में यादें ज्वार-भाटा ले आती है। 

एक सावन मेरे आँगन बरसता है,
तो दूजा मेरे भीतर बरसता है। 
इतना कुछ दिल में होने के बाद भी, 
दिल का खालीपन देख मौनता भाती है। 

मौनता का लिबास ओढ़े,
तृष्ण ख्वाहिशे आहिस्ता-आहिस्ता चलते ,
दूर कहीं दूर ठिठक कर,   
दिल की सूनी देहरी पर बैठ जाती है। 

गुजरे पलछिन अनवरत ही ,
मन के भीतर द्वंद उकेरते रहते है,
और अविस्मरणीय कल्पनाएं रीस-रीस कर 
खुश्क आँखों को धोती है। 

कभी सोचता हूँ क्या खोया ?
कभी सोचता हूँ क्या अवशेष रहा ?
निराश मन इस उधेड़बुन में उलझा रहता , 
और गुमसुम चाहतें खामोशी का लिबास ओढ़ती है।   
- विनोद निराश , देहरादून
 

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