बंद हो गिरिराज की प्रताड़ना - हरी राम यादव

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दरक दरक गिर रहे पहाड़ ,
धंस रही हैं मां बसुन्धरा ।
विकास के बड़े बड़े नाम पर,
सब हमारा ही है किया धरा ।

खोद रहे जड़ गिरिराज की,
छाती को मशीनों से छेद रहे।
आखिर सहने की भी सीमा है,
वह लगातार वेदना कैसे सहे।

शांतिप्रिय सुर भूमि को हमने,
शोर शराबे से पूरा पाट दिया,
धनलिप्सा में लिपट लिपट ,
पेड़ों को पहाड़ों से काट दिया।

हरी बन गये है हम दुश्मन,
जल जंगल और जमीन के।
पाना चाह रहे हैं हम प्रकृति से,
उसका सब कुछ छीनकर ।

बंद हो विकास के नाम पर,
मशीनों का जोर से चिग्घाड़ना।
बंद हो सुरंग और सड़कों से,
गिरिराज के समाज में प्रताड़ना।

जो आज हो रहा जोशीमठ,
वह कल होगा देहरादून में।
कारण खोजते रह जाओगे,
न मिलेगा विज्ञान के मजमून में।।
- हरी राम यादव, अयोध्या, उत्तर प्रदेश 
लेखक एवं कवि – 7087815074
 

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