तर्पण दिवस - विनोद निराश 

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वक़्त कब रुका है, वो तो अनवरत गुजरता रहता है। कभी-कभी वक़्त क्रूर काल बन कर अपनों को अपनों से विलग तो कर देता है मगर उनकी स्मृतियाँ कभी भी दिल की दहलीज़ छोड़ कर नहीं जाती। मृत्युपर्यन्त वो अशेष यादें नश्तर बन कर उरतल को कुरेदती रहती है। रिस-रिस कर पीड़ाएँ ख्वाहिशों के जख्मों को  हरा करती रहती है। जीते-जी तृषित इच्छाएँ कभी चिरनिंद्रा में विलीन नहीं होती, मगर कभी-कभी मन की पीड़ाएँ समय-समय पर ज्वार-भाटे की तरह परिवर्तित होती रहती है। मगर वो अशेष स्मृतियाँ सदैव शेष रहती है। आज दु::खी मन कई बार दर्द की पराकाष्ठा से गुजर बेबस सा होकर रह गया। हुक , क्रंदन, रुदन  ओष्ठों पर आते रहे , रह-रह कर स्मृतियाँ मष्तिष्क पटल पर चित्रित होती रही। 
आज जीवन-संगनी को विलग हुए 1 वर्ष 5 माह 15 दिन हो गए , आज उस पुण्य-आत्मा का द्वितीय तर्पण है। 3 अप्रैल 2021 रात्रि लगभग 11:20 बजे हम दोनों एक दूसरे से बिछुड़ गए थे। मुझे आज भी याद है कि लगभग 2 सप्ताह उसने कितनी कष्टकारी पीड़ा अपने शरीर पर झेली है, जिससे मैं पल-पल रू-ब-रू हुआ था। उन ह्रदय विदारक लम्हो की व्याख्या को शब्दों से बयां कर पाना संभव नहीं है। 
अंतिम दिनों में जब उसने अस्पष्ट आवाज़ में मेरे कान में कहा कि अब मेरा समय आ गया है, आप मुझे झूठी दिलासा क्यूँ दें रहे हो। ये सुनते ही मानो मेरे पैरों के नीचे से जमीं खिसक गई हो। मैंने उसका सर अपने काँधे से लगा लिया, मेरे नेत्र सजल हो गए। आँखों के सामने सारे मंज़र धुंधले से नज़र आने लगे। मेरे हाथ पसीजने लगे, मैं अवाक सा निरुत्तर हो गया। मेरी सम्वेदनाएं शून्य में विलीन हो गई। मैं जानता था कि उसका परलोक गमन निर्धारित है, मगर जाने कैसे उसे ये अनुभूति हो गई कि हम दोनों का साथ क्षणिक है। अन्ततः उसका लोक गमन हो गया। विलीन हो गये सारे स्वप्न मेरे भी उसके साथ ही। और वेदनाएं सहने को शेष रह गया सिर्फ और सिर्फ मैं। कुछ भी तो नहीं भूला हूँ मैं, आज भी सब याद है मुझे।  
ये सच है कि सांसारिक स्मृतियाँ बड़ी पीड़ादायक होती है, इतनी जल्दी पीछा नहीं छोड़ती है। वो निराश मन को सदियों तक अनवरत उद्वेलित करती रहेंगी, मगर आज तर्पण दिवस पर यही अभिलाषा है कि वो जहां हो, जिस रूप में हो बस खुश-हाल रहे यही मेरी ओर से उस पुण्यात्मा को सच्ची श्रद्दांजलि है। पितृपक्ष में पूर्वजों को स्मरण करने की प्रथा जो बनाई गई है वो सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग है। पुराणों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि इस सद्कर्म से मृत आत्मा को शांति प्राप्त होती है, और घर में उनके आशीष से सुख, शांति प्राप्त होती है।       - विनोद निराश, देहरादून (रविवार 18 /09 /2022)

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