आज बारी है नहीं - अनिरुद्ध कुमार

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वो मिलन की बेकरारी है नहीं,

रात दिन की इंतजारी है नहीं।

बैठकर देखे तमाशा हर घड़ी,

झांकते पर वो खुमारी है नहीं।

दर्द से छलनी जिगर ये जिंदगी,

मौत से हमरी करारी है नहीं।

होश भी बेहोश देखो आजकल,

क्या बतायें होशियारी है नहीं।

दौड़के आना अभी मुमकिन नहीं,

लड़खड़ाते पग सवारी है नहीं।

हाल खस्ता सैकड़ों मजबूरियाँ,

लोग जानें यार यारी है नहीं।

धड़कनें बेताब धड़के रातभर,

साँस भी लगती हमारी है नहीं।

या खुदा कैसी कयामत ढ़ा रहे,

कर रहम वैसी लचारी है नहीं।

रूठ बैठी दूर 'अनि' से दिलरुबा,

हम मिलेंगे आज बारी है नहीं।

- अनिरुद्ध कुमार सिंह

धनबाद, झारखंड

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