अनजान राहें - राधा शैलेन्द्र

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चारदीवारी में सिमटकर रहते रहते
जब ऊब जाती हूँ
तब एक" जिज्ञासा "जन्म लेती है
मन के अंदर और मैं
तब जेहनी तौर पर अनजाने से
एक अनजान सफर से जुड़ जाती हूँ
अनजान राहों ओर चल पड़ती हूँ
इस सफर में न जाने
कितने लोग मिलते है;
उनकी परेशानियों में
उलझ जाती हूँ मैं
रास्ता कोई भी हो, मंजिल कहीं भी हो,
एक भी चेहरा सफर में
मुस्कुराता नही देख पाती हूँ मैं;
गोया किसी की भी ज़िन्दगी में
मुस्कुराहट नहीं है
सुकून या खुशियों की तलाश
निरर्थक है इस यात्रा में!
सुख प्यार और अपेक्षाओं को
मिलेगा संतुलन खुद से ही-
यह जानते हुए भी
क्यों भागती हूँ मैं ऐसे सफर के पीछे
जहाँ हर इंसान भाग रहा है अपने आप से!
कैसे है यह सफर
समझ नहीं पाती हूँ,
लेकिन फिर भी
इस सफर से कर सकूँ मैं परहेज,
कहाँ हो पाता है ऐसा?
अफसोस होता है सोचकर ये
कहाँ जा रहे है हम
खुद से दूर बहुत दूर ही जा रहे है हम।
- राधा शैलेन्द्र, भगलपुर

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