उरझ गये दोऊ नैन हमारे - अनुराधा पाण्डेय 

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तुम निखरती रहो चाँदनी की तरह,
मैं बिखरता रहूँ  प्राण ! स्वीकार है ।

प्रेम जब हो गया तब ये सोचा नहीं,
है समद पार क्या और मझधार क्या ?
ये गना ही नहीं  प्रेय मधुमास है ,
शूल की क्या चुभन और पतझार क्या ?
सब शिरोधार्य है जब शुचित प्यार है ।
तुम निखरती रहो चाँदनी की तरह ,
मैं बिखरता रहूँ  प्राण ! स्वीकार है ।

मैं  करूँ उफ प्रिये ! भूल से भी नहीं ,
हो मिलन पुष्प या हो विरह शूल ही ।
काट कर देख लो तुम अगर जी करे ,
डाल ही भर  नहीं तरु विटप मूल ही ।
दोष गणना प्रणय में निराधार है ।
तुम निखरती रहो चाँदनी की तरह ,
मैं बिखरता रहूँ  प्राण ! स्वीकार है ।

देह में है बचा प्राण जब तक शुभे ! 
भूल कर भी तुम्हें पीर होने न दूँ। 
अश्रु सब पण्य कर लूँ किसी मूल्य पर,
कोटि हो दुख तुम्हें किन्तु रोने न दूँ। 
व्यर्थ जीना रहा इस जगत में मुझे..
रंच भी यदि तुम्हे प्रिय ! व्यथा भार है ।
तुम निखरती रहो चाँदनी की तरह ,
मैं बिखरता रहूँ  प्राण ! स्वीकार है ।
 - अनुराधा पाण्डेय द्वारिका , दिल्ली
 

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