फवाद अंदराबी

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कानों में रस घोलती

सारंगी

कहीं नहीं गई

दीवार की खूंटी पर

झूल रही है

लफ़्ज़, सुर, लय

ख़त्म नहीं हुए

अका-थका मन

सुरताल में नहाकर है

अब भी

संवादी-विस्मादी

दिल-दिमाग के रास्ते में

यह पड़ाव

आज भी टुनटुनाता है

बेशक आवाज़ को

ख़ामोश कर गए जाबिर-जल्लाद

और धीरे-धीरे घुन खाकर

ख़त्म हो जाएगी सारंगी भी

सिर को बेंधती

गोली की आवाज क्या आई,

कितने दिलों में

जाग उठी

धुनें बिखेरती सारंगी

जैसे ख़ला को चीरती रौशनी

धड़का दिल

तारों ने धुन पकड़ी

गज पकड़ने के लिए

आगे बढ़ा हाथ

गोली ने एक सिर बेंधा था

अब फ़िज़ाओं में

गूंज उठे हैं सुर

गाने लगे हैं अल्फ़ाज़

फवाद अंदराबी!

फवाद अंदराबी !!

फवाद अंदराबी!!!

(* फवाद अंदराबी* अफगानी लोक गायक, जिसे ज़ालिम तालिबान ने गोली मार दी थी)

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