कितना सही साबित होगा कांग्रेस का राजा दिग्विजय सिंह पर दांव - पवन वर्मा

 
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utkarshexpress.com - देश की राजनीति में अपने बयानों को लेकर चर्चित रहने वाले दिग्विजय सिंह इन दिनों मध्य प्रदेश की जमीं पर जमकर पसीना बहा रहे हैं। शायद उनके जीवन का यह पहला और आखिरी चुनाव होगा जिसमें उन्हें भरी गर्मी में राजे-रजवाड़े और बड़े नेता की शान शौकत छोड़कर इस तरह से जमीन पर उतरकर काम करना पड़ रहा है। राजगढ़ लोकसभा वह क्षेत्र है जिसमें दिग्विजय सिंह की रियासत राघोगढ़ भी आती है। पूरे क्षेत्र में दिग्विजय सिंह आज भी राजा साहब या हुकुम के नाम से ही जाने और पहचाने जाते हैं। अब देखना यह होगा कि दिग्विजय सिंह के यहां से चुनाव लड़ने से मना करने के बाद कांग्रेस आला कमान का उनको इस सीट से चुनाव लड़ाने का फैसला सही साबित होता है, या पिछले बार की ही तरह दिग्विजय सिंह को इस बार भी लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना होगा।
नहीं चल पाया राजा का राज - 
दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश में कई लोगों को टिकट दिलाते हैं। वे पिछले चुनाव में भोपाल से मिली तीन लाख से ज्यादा वोटों की हार के बाद इस बार लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे।  इसलिए  हमेशा की तरह वे इस बार भी अपने क्षेत्र राजगढ़ से अपने किसी समर्थक को ही टिकट दिलवाना चाहते थे। जब यहां से टिकट दिए जाने की बात चल रही थी, तब दिग्विजय सिंह का नाम भी दावेदारों में शामिल माना गया। लेकिन उन्होंने अपने पैर पीछे खींच लिए थे और अपने रिश्तेदार एवं पूर्व मंत्री प्रियव्रत सिंह को चुनाव लड़वाने के लिए आगे किया। मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह से भी प्रियव्रत सिंह की रिश्तेदारी है, दिग्विजय सिंह ने प्रियव्रत सिंह के  साथ ही अपने समर्थक एक अन्य पूर्व विधायक का नाम भी आगे किया। दिग्विजय सिंह का यह दांव चल नहीं पाया और पार्टी ने ऐनवक्त पर उन्हें ही उम्मीदवार बना दिया।
 राजगढ़ में नहीं रहे कभी भारी -
दिग्विजय सिंह का राजगढ़  लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस की तरफ से एक छत्र राज चलता रहा  है। कांग्रेस में इस क्षेत्र में उनकी रजामंदी के बिना कोई फैसला नहीं होता है, लेकिन वे कभी यहां से भारी या बहुत मजबूत उम्मीदवार के रूप में साबित नहीं हो सके।  दिग्विजय सिंह इस क्षेत्र से पूर्व में तीन चुनाव लड़ चुके हैं। इंदिरा लहर में वे यहां से एक लाख 52 हजार वोटो से जीते थे, लेकिन अगला चुनाव वे भाजपा के प्यारेलाल खंडेलवाल से हार गए थे। उन्हें तब 67 हजार से ज्यादा वोटों से हार मिली थी। इसके बाद वे 1991 का लोकसभा चुनाव महज एक हजार 470 वोटों से ही जीत सके थे। इसके बाद वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए और फिर उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी एक तरफा चलाई और अपने छोटे भाई लक्ष्मण सिंह को इसी सीट से लोकसभा में भेजा। बाद में छोटे भाई का भी कांग्रेस से मोह भंग हो गया और वे भाजपा में शामिल हो गए और भाजपा के टिकट पर सांसद भी इसी सीट से बने। अब लक्ष्मण सिंह कांग्रेस में हैं और राजगढ़ लोकसभा क्षेत्र में आने वाले चाचौड़ा विधानसभा से हाल ही में चुनाव हारे हैं। उनके बेटे जयवर्धन सिंह अपने पिता की रियासत से महज साढ़े तीन हजार वोटों से ही विधानसभा का चुनाव जीत सके।
बहा रहे पसीना -
दिग्विजय सिंह ने चुनाव जीतने के लिए पैदल चलने का सहारा लिया। उन्होंने नामांकन भरने से पहले संसदीय क्षेत्र के सभी विधानसभा क्षेत्रों में लगातार आठ दिन तक 10 से 15 किलोमीटर की पदयात्रा की।  पहली बार वे राजगढ़ संसदीय क्षेत्र में इतने किलोमीटर तक पैदल चले हैं। भरी गर्मी में राजा दिग्विजय सिंह का पैदल चलना यही बताता है कि वे कड़े मुकाबले में फंस गए हैं।
अब राजनीतिक साख पर सवाल - 
दिग्विजय सिंह वर्ष 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भोपाल से कांग्रेस उम्मीदवार बने थे। तब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और कमलनाथ मुख्यमंत्री थे। इस सरकार में दिग्विजय सिंह बहुत ताकतवर माने जाते थे। उनके बेटे जयवर्धन सिंह इस सरकार में मंत्री थे। भोपाल से विधायक पीसी शर्मा और आरिफ अकील कमलनाथ की सरकार में मंत्री थे। दोनों ही मंत्री दिग्विजय सिंह गुट के थे। दिग्विजय सिंह को तब शायद यह लगा होगा कि  भोपाल लोकसभा क्षेत्र से उनकी जीत आसान रहेगी, इसलिए वे यहां से चुनाव में उतर गए, लेकिन उन्हें  भाजपा की प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने साढ़े तीन लाख से ज्यादा वोटों से हरा दिया। कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति में दखल रखने वाले दिग्विजय सिंह अभी राज्यसभा के सदस्य हैं, लेकिन जनता के बीच उनकी साख कैसी है यह अब कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को इस चुनाव परिणाम से पता चल जाएगा। राजगढ़ संसदीय क्षेत्र उनका गृह क्षेत्र हैं। यहां पर उनकी रियासत है, जिसके वे राजा है। इसलिए इस क्षेत्र में वे राजा और हुकुम जैसे संबोधन से जाने जाते हैं।
फिर सामान्य नेता से ही मुकाबला -
पिछले चुनाव में दिग्विजय सिंह के खिलाफ भाजपा ने बहुत ही सोची समझी रणनीति के तहत  प्रज्ञा ठाकुर को मैदान में उतारा था। जो प्रज्ञा ठाकुर राजनीति का क, ख, ग भी नहीं सीखी थी, उन्होंने दिग्विजय सिंह को मात दी। प्रज्ञा सिंह ने इस चुनाव से ही राजनीति में प्रवेश किया था।  अब राजगढ़ से भी भाजपा ने रणनीति के तहत ही दो बार के सांसद रोड मल नागर को मैदान में उतारा है। दिग्विजय सिंह का नाम आने के बाद भी भाजपा ने यहां से उम्मीदवार नहीं बदला। यानि एक बार फिर यहां से भाजपा ने दिग्विजय सिंह के कद के मुकाबले में छोटे कद के नेता को मैदान में उतारा है। अब इस सीट पर दिग्विजय सिंह पर कांग्रेस आला कमान का दांव लगाना कितना सही साबित होगा यह चार जून को ही पता चलेगा।(विनायक फीचर्स)

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