माँ - अनुराधा पांडेय

pic

माँ सृजन भर ही नहीं है ।
माँ जगत संजीवनी है ।
नकचढ़ी जब धूप जग में,
प्राण झुलसाती निरंतर ।
काल करता वार मन पर,
जब व्यथा उठती भयंकर ।
माँ  विकल तब भग्न चित पर...
बूँद पावन श्रावणी  है ।
माँ  जगत संजीवनी  है ।
दोष संतति के हजारों,
ढांक देती मातृ ममता ।
और दूजा कौन माँ-सा ,
जो करेगा रंच समता ।
म्लान चाहे पुत्र जितने...
मातृ गंगे पावनी है ।
माँ जगत संजीवनी है ।
माँ बिहँस कर पुत्र सिर पर,
जब हथेली फेर देती ।
एक क्षण में वेदना औ,
क्लेश सारे सोख लेती ।
मात्र है इक माँ सतत जो
पुत्र हित की कामिनी है ।
माँ जगत संजीवनी है। 
- अनुराधा पांडेय, द्वारिका , दिल्ली

Share this story