पुरातन वर्ष मैं आभार देती हूँ - अनुराधा पाण्डेय

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गत-नव वर्षों का संधिकाल ,
जी करता इसमें हृदसरोज !
तुम से यदि हो जाता मिलाप ।

मर जाता निर्जन विषम नाद,
मिट जाता गत का व्यथा भार ।
कट जाते मन के विविध क्लेश ,
रुक जाता विधि का चिर प्रहार ।
हो आलिंगन में उभय बद्ध ,
यदि क्षण भर भी करते विलाप ।
तुम से यदि हो जाता मिलाप ।

हो जाते मूर्तित विगत स्वप्न,
मिल जाता हृद को ललित पंख ।
छू आते हम नूतन वितान,
तुमको भरकर प्रिय ! प्रणय अंक ।
हो जाता निर्झर हृदय वज्र,
कट जाते कल के सकल शाप ।
तुम से यदि हो जाता मिलाप ।

दो वर्षों का यह संधि काल ।
जी करता इसमें हृद सरोज !
तुम से यदि हो जाता मिलाप ।
-अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली  
 

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