बारिश - झरना माथुर 

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बारिश की बूंदों ने संगीत की महफिल सज़ाई है,
हवाओं ने भी संग बासुरी झूम-झूम बजाई है।

अब ये बादल भी पीछे कब कहाँ यूँ रहने वाला था,
बादलों ने भी गरज- गरज ताल से ताल मिलाई है।

फिर घिर- घिर के आयी है ये काली घटायें घनघोर,
इन घटाओ मे बिजली ने अपनी चमक चमकाई है।

अब तो रोज सुबह- शाम को महफिल ही सजती रहेगी,
बरखा ने इस धरती को धानी चूनर पहनाई है।

कोयल कूके पपीहा गाये मोर भी नाचा जाये,
ऋतुराज  ने सबके चेहरों पे खुशियाँ झलकाई है।
- झरना माथुर, देहरादून , उत्तराखंड 
 

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