गीत - मधु शुक्ला 

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जिन  कंधों  पर जिम्मेदारी , सर्वाधिक  होती  है,
पुरुष उसी को कहते जिसकी,आँख नहीं रोती है।

धूप  सहे  दे  छाया  घर  को, घर में लाये रोटी,
पूर्ण करे परिजन की इच्छा, बड़ी रहे या छोटी।
सदा छुपा रहता मानव की , इच्छा का मोती है....... ।

रहे मोम सम दिल लेकिन वह, सख्त दिखे आनन से,
बाहर  बीते  समय  अधिकतर, मन न  हटे आँगन से।
उसकी खुद्दारी दुनियाँ में, प्रगति बीज बोती है........ ।

कुछ गुण कुछ अवगुण का पुतला, मानव कहलाता है।
अपनेपन   से   आरोपों   का, वह  जहर  पचाता  है।
सद्कर्मों  से  मैल  हृदय  का, सज्जन ही धोता है...... ।
--- मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश
 

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