चन्द शे'अर - विनोद निराश 

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ये शामे-तन्हाई , और तेरा छत पे आना,
अब छोड भी दो, दिल-ए-सब्र आजमाना।
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न करीब आया कर, तू मेरे इतने ,
मस'अले और बढ़ जाएंगे उतने। 
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खाया है दिल ने फिर से फरेब, इक नया,
किताबे-ज़िंदगी में जुड़ गया, वर्क इक नया।  
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बिछुड़ा वो इस अदा से कि, याद आता रहा ,
देर तक प्यार उसका, मुझे भी सताता रहा।
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ये उनके और मेरे, दिल का मसअला है ,
ए मुक़ददर तू, इस बीच में क्यूँ आता है। 
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तकाज़ा बयां कर देता है , कोई कहे न कहे ,
दर्दे-दिल बड़ा मुश्किल है, वही जाने जो सहे। 
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कभी नसीब, आजमा कर तो देखिए ,
कभी खुद, खुद से हार कर तो देखिए। 
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बेशक कहने को, अलफ़ाज़ न मिले ,
मगर जब भी मिले , लगे न मिले। 
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मुद्दत से नहीं मिला हूँ मैं खुद से ,
तेरा ख्याल ही नहीं छोड़ता मुझे।
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इश्क़ रो पड़ेगा मेरा, तेरी जफ़ा देख कर, 
ज़माना क्या कहेगा, मेरी वफ़ा देख कर । 
- विनोद निराश , देहरादून

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