चुगली - अनिरुद्ध कुमार

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चुगली को मानें कला, सहज सरल संवाद।
चुगलखोर पदवी बड़ी, सबको रहता याद।१।

चुगलखोरी नहीं बुरी, इसमें प्रेम प्रवाह।
इक दूजे के चाह से, करता सदा अगाह।२।

समझ समझ का फेर है, चुगलखोर आबाद।
सच्च झूठ सब बोल दे, जन जन देता दाद।३।

प्रेम भाव इसमें बड़ी, सबसे है अनुराग।
जीवन को जागृत करे, लग जाये ना आग।४।

चुगली को गुगली समझ, खोले सबके पोल।
जैसा को तैसा मिला, नाहक पीटत ढ़ोल।५।

चुगलखोर चिंतन करे, बिना बैर या द्वेष।
हीन भाव नाहक धरे, सेवा समझ विशेष।६।

चुगली चेतक जान ले, संभल करो व्यवहार।
प्रतिक्रिया नहीं दें कभी, करना जरा विचार।७।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

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