गीत - जसवीर सिंह हलधर 

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बादलों की है नुमाइश शुष्क झीलों के शहर में ।
चांदनी करती तमाशा  राख  टीलों के शहर में ।।

पांव दल दल में  सभी के और आगे बढ़ रहे हैं ।
देश के कानून का आलेख उल्टा पढ रहे हैं ।
हाथ में भाला लिए कुछ घूमते नेता शिकारी ,
मुर्गियां भी रो रहीं हैं कुटिल भीलों के शहर में ।।
बादलों की है नुमाइश शुष्क झीलों के शहर में ।।1

जुगनुओं को देखिए तो आँख सूरज को दिखाते ।
आढ़ती के जाल को सुंदर कढ़ी चादर बताते ।
खेत के कानून पर उन्माद पैदा कर चुके हैं ,
अक्ल पर पत्थर पड़े हैं इन कबीलों के शहर में ।।
बादलों की है नुमाइश शुष्क झीलों के शहर में ।।2

फौज पर उंगली उठाते हैं यहां लफ्फाज देखो ।
सरहदें थामे खड़े हैं देश के जांबाज  देखो ।
मौत के माथे लकीरें खींचते हैं रोज सैनिक ,
जान की बाजी लगाये काक चीलों के शहर में ।।
बादलों की है नुमाइश शुष्क झीलों के शहर में ।।3

चोर चौकीदार में भृकुटि लगी हैं रोज तनने ।
एक साधू आ गया लो देश का सरदार बनने ।
देश करवट के रहा है राह अपनी गढ़ रहा है,
योजना बनने लगीं हैं सुस्त ढीलों के शहर में ।।
बादलों की है नुमाइश शुष्क झीलों के शहर में ।।4

प्यार की गजलें यहां अब सार्थकता खो रहीं हैं ।
धर्म के उन्माद पर ढोंगी रुदाली रो रहीं हैं।
मज़हबी आलेख अंकित हो रहे हैं गोष्ठियों में ,
आग गीतों से उगी है कुछ हठीलों के शहर में ।।
बादलों की है नुमाइश शुष्क झीलों के शहर में ।।5

योजनाएं आ रही हैं कौम को आगे बढ़ाने ।
पर यहां कुछ लोग तो उल्टा लगे इनको पढ़ाने ।
जातियों की खाप ही खुद राह को रोके खड़ीं हैं ,
कौन क्या आगे बढ़ेगा तार कीलों के शहर में ।।
बादलों की है नुमाइश शुष्क झीलों के शहर में ।।6

प्रश्न माली पर उठाते कह रहे दुश्मन चमन का ।
दे रहा पैगाम "हलधर" देश में सबको अमन का ।
जिददियों के सामने सरकार पीछे हट चुकी है ,
खो गया कानून इन झूंठे वकीलों के शहर में ।।
बादलों की है नुमाइश शुष्क झीलों के शहर में ।।7
- जसवीर सिंह हलधर, देहरादून  
 

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