ग़ज़ल - डॉ० अशोक ''गुलशन''

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तुम याद में मेरी कब तक यूँ अपने दिल को समझाओगे,
कब तक न हंसोगे यार मेरे तुम कब तक अश्क़ बहाओगे |

है यार फ़क़त दो-चार घडी जीवन में खुशियों का सागर,
तुम कहाँ-कहाँ तक जनम-जनम दुःख को ही गले लगाओगे|

आ जाओ मिलकर प्यार करें हम यार भुलाकर सारे ग़म ,
क्या पता कहाँ पर शाम ढले कब तक यूँ ही भरमाओगे|

मंज़िल है अपनी दूर नहीं बस हाथ न छोडो राहों में ,
चलते-चलते तुम ऐसे ही अपनी मंज़िल पा जाओगे|

सावन की बहारें देखो तो आयी हैं हमारे ''गुलशन'' में,
ग़र इनसे प्यार निभाओगे तो खुशियाँ ही बरसाओगे|
- डॉ. अशोक ''गुलशन’’,  कानूनगोपुरा (उत्तरी), बहराइच (उ०प्र०)
 

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