ग़ज़ल -  डॉ. अशोक ''गुलशन' 

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जिसको ढूंढा किये आज तक सूरज-चाँद -सितारों में,
वह ज्योतिर्मय छुपा हुआ है अंतस के उजियारों में।

किसको-किसको लूटें-खायें किसको-किसको धोखा दें,
इन्हें छोड़ उपकार की बातें आयें कहाँ विचारों में।

शाहजहाँ होकर जब कोई बनवाता है ताजमहल ,
हर शिल्पी का लहू बोलता है ज़ालिम तलवारों में।

एक जाल दरिया में फेंका मछली ले बाहर आया,
ऐसा फन तो सिर्फ मिलेगा दुनिया के मछुवारों में।

जिसको हमने रहबर समझा और कभी विश्वास किया,
उसने ही लूटा है हमको भीड़ भरी बाजारों में।

इसीलिये बेटे को काजल माँ भरपूर लगाती है,
नज़र न लग जाये दुनिया की उसे कहीं व्यवहारों में।

शायद काँधा नहीं मिलेगा बाप सोचकर रोता है,
उसका बेटा नहीं रहा है अब उसके अधिकारों में।

इस कुर्सी से उस कुर्सी तक बहराइच से दिल्ली तक,
पागल ''गुलशन'' दौड़ रहा है सत्ता के गलियारों में।
- डॉ. अशोक ''गुलशन' 'उत्तरी कानूनगोपुरा, बहराइच (उ०प्र०)
 

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