हिंदी ग़ज़ल - जसवीर सिंह हलधर

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सभी बचपन की वो बातें सुहानी याद हैं मुझको ।
सुने दादी से किस्से खानदानी याद हैं मुझको ।

मेरी नानी भी मुझको हद से ज्यादा करती थी ,
सुनीं राजा फकीरों की कहानी याद हैं मुझको ।

हमारे गांव में कोठी सिंचाई महकमे की थी ,
दुपहरी भर वहां की छेड़खानी याद हैं मुझको ।

मसाला नौन मिर्ची का बनाकर साथ रखता था ,
वो कच्ची आमियां छुपकर चुरानी याद हैं मुझको ।

तमाशे और नौटंकी अभी भूला नहीं हूँ मैं ,
बड़ों की इस वज़ह से मार खानी याद हैं मुझको ।

अभी रोशन हैं चाहत के झरोखे इस बुढ़ापे में ,
वो चिठ्ठी प्यार की लिखनी छुपानी याद हैं मुझको ।

कबड्डी और कुश्ती का जमाना क्या जमाना था ,
सुनो "हलधर" सभी बातें पुरानी याद हैं मुझको ।
- जसवीर सिंह हलधर, देहरादून  

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