मुक्तक – डॉ. अशोक ‘’गुलशन’’

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शायद तुमसे प्यार हुआ है,
ऐसा कुछ आसार हुआ है।
पहले कभी नहीं ऐसा था,
ऐसा पहली बार हुआ है।
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मेरे जीवन के मरूस्थल में सावन झरने दो,
मेरे पतित हुए इस तन को पावन करने दो।
बहुत दिनों से तृषित रहा है मन उपवन मेरा,
अपने रूप-सरोवर में अवगाहन करने दो।
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तुम्हारे होंठ हैं प्यासे तो मेरे भी अधर प्यासे,
उधर हो तुम अगर प्यासे तो हम भी हैं इधर प्यासे।
तुम्हारे प्यार में अपना हुआ है हाल कुछ ऐसा,
है दोनों की नजर प्यासी हैं दोनों के जिगर प्यासे।
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बैल-भुसैला,खेत-मड़ैया घर में गेहूँ-धान है,
मैं किसान हूँ मेरी जग में इन सबसे पहचान है।
ठाट-बाट की नहीं है चिन्ता नहीं वस़्त्र का ध्यान है,
फिर भी अपना इस दुनिया में मान और सम्मान है।
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कहीं उजड़ा चमन है तो हरी कुछ बस्तियाँ भी हैं,
जहां दरिया मचलता है वहाँ कुछ कश्तियाँ भी हैं।
जलाना मत हमारा आशियाना यह गुज़ारिश है,
हमारे फूस के घर में तुम्हारी चिट्ठियाँ भी हैं। 
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तुम्हारी याद के मादक नशे में झूम लेता हूँ ,
तुम्हारी इक झलक खातिर शहर भर घूम लेता हूँ ।
मगर जब चैन कुछ मिलता नहीं मुझको अकेले में,
तुम्हारी दी हुई तस्वीर लेकर चूम लेता हूँ ।
-----डॉ० अशोक ‘’गुलशन’’
उत्तरी कानूनगोपुरा, बहराइच (उ०प्र०)

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