गीत- (विश्व हिंदी दिवस पर) - जसवीर सिंह हलधर 

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काव्य रूपी नाव ले उस पार जाना चाहता हूँ ।
शब्द की पतवार से  सागर  हराना चाहता हूँ ।।

गद्द रूपी पंक्तियों को तोड़कर कविता बनायी ।
रेत  में डूबी नदी को खोद कर सरिता बहायी ।
जोड़ अक्षर के सहारे, तोड़ लाया चाँद तारे ,
जिंदगी के इस किले को यूँ सजाना चाहता हूँ ।।
शब्द की पतवार से सागर हराना चाहता हूँ ।।1।।

जनता हूँ इस जगत में पुष्प की है आयु कितनी ।
और जीवन की गगर में प्राण रूपी वायु कितनी ।
ओज के यशगान न्यारे , मौन करुणा के सहारे,
फैल कर आकाश तक विस्तार पाना चाहता हूँ ।।
शब्द की पतवार से सागर हराना चाहता हूँ ।।2।।

जीवनी कैसा प्रभंजन और कितनी आपदाएं ।
एक तरणी एक नाविक नापनी हैं दस दिशाएं ।
दिख रहा आता बुढापा , देह का हर रोम काँपा ,
उठ रहे तूफान पर अंकुश लगाना चाहता हूँ ।।
शब्द की पतवार से सागर हराना चाहता हूँ ।।3।।

हाथ की रेखा हमेशा भाग्य लीकों से लड़ी है ।
भूख पीछे छोड़ता हूँ प्यास मुँह खोले खड़ी है ।
भूत के आयाम सारे , राह आगे की सँवारे ,
प्रीत "हलधर"गीत में अमरत्व लाना चाहता हूँ ।।
शब्द की पतवार से सागर हराना चाहता हूँ ।।4।।
- जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
 

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