अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना घातक है

politics

Utkarshexpress.com देहरादून- कांग्रेस की आस और उम्मीद को हरदा इस तरह कुचल देंगे, इसकी उम्मीद तो नहीं थी। जब सब कुछ ठीक चल रहा था तो क्यों इस कदर बवाल किया? यह समझ से परे तो नहीं लेकिन पार्टी नेतृत्व को दबाव में लेने की रणनीति तो मानी ही जा सकती है। इसलिए कहावत भी हरदा बदल रहे हैं। अभी तक की प्रचलित कहावत यही थी कि अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना घातक होता है लेकिन यहाँ एक कदम आगे बढ़ कर हरदा ने कुल्हाड़ी पर पैर मार दिया है और फैसला अगले साल यानी नए साल पर छोड़ दिया है, वह भी बाबा केदार पर कि वही अब मेरा मार्गदर्शन करेंगे।
बुधवार को सोशल मीडिया पर जैसे ही हरदा की पोस्ट वायरल हुई, बवाल हो गया। पहले से तैयार बैठे शागिर्द ने आग में घी डालने में ज़रा भी देर नहीं लगाई कि पार्टी के प्रदेश प्रभारी ने राहुल गाँधी के साथ लगे हरदा के पोस्टर को हटवा दिया था। यानी नाराजगी की यही एक वजह थी। वह भी एक हफ्ते बाद बाहर आई। यानी इतने दिन तक खून के आंसू पीते रहे?
अब एक नजर कांग्रेस के सिस्टम पर डालनी होगी। यहाँ तो जिले का अध्यक्ष भी दिल्ली से तय होता है, फिर दिल्ली को आँख दिखाने की जरुरत कैसे हो सकती है। हो सकता है आपको प्रभारी यादव से दिक्कत हो लेकिन यह कैसे भूला जा सकता है कि यादव आखिर राहुल के ही प्रतिनिधि हैं। यानी राहुल के रूप में यादव देहरादून देख रहे हैं। हरदा भी तो पहले असम और फिर पंजाब देख रहे थे। यानी दोनों जगह वे राहुल की ही आँख, नाक और कान थे। वहाँ क्या कुछ नहीं हुआ, किसी से छिपा है क्या? फिर क्यों बनी बनाई खीर में राख डालने की सूझी, यह एक अनुत्तरित सवाल है। लेकिन यह बात अपनी जगह कायम है कि अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने को जोखिम लेने की क्यों सूझी? यहाँ तो एक कदम आगे बढ़ कर कुल्हाड़ी पर पैर मारने की स्थिति नजर आ रही है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस की अन्तर्कलह का आखिरी नतीजा किस रूप में सामने आता है। आप भी बराबर नजर रखिये। दिलचस्प नजारा जल्द आपके सामने हो सकता है।
Utkarshexpress.com देहरादून- कांग्रेस की आस और उम्मीद को हरदा इस तरह कुचल देंगे, इसकी उम्मीद तो नहीं थी। जब सब कुछ ठीक चल रहा था तो क्यों इस कदर बवाल किया? यह समझ से परे तो नहीं लेकिन पार्टी नेतृत्व को दबाव में लेने की रणनीति तो मानी ही जा सकती है। इसलिए कहावत भी हरदा बदल रहे हैं। अभी तक की प्रचलित कहावत यही थी कि अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना घातक होता है लेकिन यहाँ एक कदम आगे बढ़ कर हरदा ने कुल्हाड़ी पर पैर मार दिया है और फैसला अगले साल यानी नए साल पर छोड़ दिया है, वह भी बाबा केदार पर कि वही अब मेरा मार्गदर्शन करेंगे।
बुधवार को सोशल मीडिया पर जैसे ही हरदा की पोस्ट वायरल हुई, बवाल हो गया। पहले से तैयार बैठे शागिर्द ने आग में घी डालने में ज़रा भी देर नहीं लगाई कि पार्टी के प्रदेश प्रभारी ने राहुल गाँधी के साथ लगे हरदा के पोस्टर को हटवा दिया था। यानी नाराजगी की यही एक वजह थी। वह भी एक हफ्ते बाद बाहर आई। यानी इतने दिन तक खून के आंसू पीते रहे?
अब एक नजर कांग्रेस के सिस्टम पर डालनी होगी। यहाँ तो जिले का अध्यक्ष भी दिल्ली से तय होता है, फिर दिल्ली को आँख दिखाने की जरुरत कैसे हो सकती है। हो सकता है आपको प्रभारी यादव से दिक्कत हो लेकिन यह कैसे भूला जा सकता है कि यादव आखिर राहुल के ही प्रतिनिधि हैं। यानी राहुल के रूप में यादव देहरादून देख रहे हैं। हरदा भी तो पहले असम और फिर पंजाब देख रहे थे। यानी दोनों जगह वे राहुल की ही आँख, नाक और कान थे। वहाँ क्या कुछ नहीं हुआ, किसी से छिपा है क्या? फिर क्यों बनी बनाई खीर में राख डालने की सूझी, यह एक अनुत्तरित सवाल है। लेकिन यह बात अपनी जगह कायम है कि अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने को जोखिम लेने की क्यों सूझी? यहाँ तो एक कदम आगे बढ़ कर कुल्हाड़ी पर पैर मारने की स्थिति नजर आ रही है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस की अन्तर्कलह का आखिरी नतीजा किस रूप में सामने आता है। आप भी बराबर नजर रखिये। दिलचस्प नजारा जल्द आपके सामने हो सकता है।

Share this story