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शाम की चाय – रश्मि पोखरियाल

शाम की चाय कुछ,
तेरी मोहब्बत सी हो गई है|
कभी मीठी तो कभी,
फीकी सी हो गई है|
जाने क्यों तलब सी,
उठती है बार-बार,
होठों तक आते-आते,
मचलने सी लगती है|
शाम की चाय,
कुछ तुम सी हो गई है|
– रश्मि मृदृलिका, देहरादून



