गंगा स्तुति – मणि अग्रवाल

नमामि गंग अम्बिके!, नमामि कष्टहारिणी!
प्रणाम मोक्षदायिनी!, तु पूर्णब्रह्मरूपिणी!
विशुद्ध नेह दायिनी, तपस्विनी, शुभंगिनी।
प्रचंड वेग धार ले, अमर्ष में तरंगिनी।।
त्रिशूल, शंख, चक्र माँ, पिनाक, पद्म धारिणी।
निशंक भाव दान दे, अनिष्टता निवारिणी।
सु-श्वेत पीत, केसरी, अनूठ वस्त्र धारती।
पुराण-वेद बाँचते, तु सृष्टि को सँवारती।।
महेश केश मध्य में , नदीश्वरी विराजती।
पुनीत नीर रूप में, धरा सु-क्रोड साजती।
महंत संत भाव से , करे अखंड आरती।
अनिष्टता,अशुद्धता, कु-दोष माँ निवारती।।
अनेक व्याधिनाशिनी, प्रदीप्त पुण्य शक्तियाँ।
बहाव अंक में लिये, अनर्थसाध्य युक्तियाँ।
न यज्ञ,मंत्र, होम से, न दिव्य देव ध्यान से।
विमुक्ति मार्ग पुष्ट हो, जगत्प्रिये सु-पान से।।
बखान हे भगीरथी! , अनंत है प्रताप का।
प्रभाव ही अमोल है, सु-गंग-गंग जाप का।
नमो नमो सुदेविके, करूँ सदैव वंदना ।
हिया उमंग नाम की, कदापि होय मंदना।।
-मणि अग्रवाल “मणिका, देहरादून उत्तराखंड



