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गणतंत्र दिवस को मात्र एक उत्सव के रूप में देखा जाना सही नहीं है – डॉ क्षमा कौशिक

utkarshexpress.com देहरादून – 26 जनवरी 1950 भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिवस है जब भारत ने अपना संविधान लागू कर अपने को पूर्ण प्रभुता-संपन्न , धर्म- निरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया।
यह प्रत्येक भारतवासी के लिए गौरव का विषय है कि आज भारत विश्व का सबसे बड़ा और सफल गणतंत्रात्मक देश है।
जिसमें अधिकारों की सूची ही नहीं, कर्त्तव्यों की अनुप्राणित शृंखला है जो शासन की प्रणाली को समृद्ध करती है। भारत का संविधान भारत वासियों को धर्म, जाति ,संप्रदाय से ऊपर उठकर न केवल अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार देता है, इस पर भी दृष्टि रखने की स्वतंत्रता भी देता है कि उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि उसकी अपेक्षाओं पर खरे उतर भी रहें हैं या नहीं।
यह एक सुव्यवस्थित तंत्र है जो संवैधानिक रूप से कर्त्तव्य, अधिकार और नैतिक मूल्यों के समन्वय से सुशासन की मौलिकता को संरक्षित करता है, उसकी सीमाएं निर्धारित करता है और सत्तात्मक तंत्र को मर्यादित रहने की चेतावनी देता है । गणतंत्रात्मक व्यवस्था सत्ता का विकेंद्रीकरण करके विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका को निरंकुश होने से बचाकर लोकतांत्रिक मूल्यों को संरक्षित करती है।संविधान एक ओर नागरिकों को स्वतंत्र अभिव्यक्ति, समानता और सम्मान पूर्वक जीने का अवसर देता है वहीं राष्ट्र, समाज और संविधान के प्रति कर्त्तव्योन्मुख करने का कार्य भी बखूबी करता है।
गणतंत्र दोनों में संतुलन करते हुए चलता है। सही अर्थों में गणतंत्र तभी सशक्त होता है जब नागरिक सचेत और सक्रिय हों, सत्तात्मक पक्ष जनहित में कृत संकल्प हो और शासन प्रणाली सुव्यवस्थित हो।यह ऐसी औपचारिक व्यवस्था है, ऐसी विधिक प्रणाली है जिसे सतत संवर्धन की आवश्यकता है। इसमें पारदर्शिता के साथ साथ नैतिकता और जनहित का भाव सतत प्रवाहित होना अति आवश्यक है। सक्रिय चेतना और जन भागीदारी गणतंत्र को मजबूत बनाती है। भारत के गणतंत्र की यह खूबसूरती उसे सर्वश्रेष्ठ बनाती है।
आज के समय में जब लोकतांत्रिकता के सम्मुख अविश्वास, कुटिल राजनीति ,नैतिक अभाव और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौतियाँ हैं तब गणतंत्र को सजगता पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों से ही संरक्षित किया जा सकता है, संवर्धित किया जा सकता है, सशक्त बनाया जा सकता है ।
यह एक मंत्र नहीं एक तंत्र है जब सत्ताधारी पक्ष और आम जनता इस तंत्र को समझकर पूर्ण निष्ठा से समझ कर निभाते हैं तभी गणतंत्र सच्चे अर्थों में जीवित रहता है।
गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस को मात्र एक उत्सव के रूप में देखा जाना सही नहीं है।
सरकारी भवनों, सार्वजनिक स्थानों, विद्यालयों में ध्वजारोहण, भाषण, परेड और भव्य झांकियाँ l
उत्सव की भव्यता ही पर्याप्त नहीं,शासक और जनता दोनों की उसकी आत्मा से, मौलिकता से प्रतिबद्धता परम आवश्यक है।
गणतंत्र महा उत्सव के साथ सुव्यवस्थित तंत्र है जो निरंतर अनुशासन, समझ और सहभागिता से संचालित होता है जिसकी सार्थकता उसके कर्त्तव्यबोध और सटीक संवैधानिक प्रक्रिया में निहित है।
हमें गर्व है हम भारत जैसे जनप्रभुता संपन्न देश के वासी हैं और गर्व से अपना सतत्तरवा गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं।
है महापर्व गणतंत्र दिवस , बस उत्सव मात्र नहीं मानों।
यह महातंत्र यह महामंत्र,इसको शासन की धुरि जानों।
यह देता है अधिकार सभी,कर्त्तव्यों को भी समझाता।
गणतंत्र एकता समता का, समवेत रूप है दिखलाता।।
– डॉ क्षमा कौशिक, देहरादून , उत्तराखण्ड

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