मनोरंजन
ग़ज़ल – रीता गुलाटी

आ लगा ले तू ल़ग़न बढतें हुऐ सपनो के लिये।
अब सम्भालेगे इल्म को भी किताबों के लिये।
खूबसूरत सा लगे गीत मेरे दिलबर का।
तान छेड़ी है मधुर आज भी गीतों के लिये।
हौसला तुम भी रखो यार भले हो मुश्किल।
सोचना हमको भी है आज अदीबों के लिये।
दिल मेरा मुब्तला होता है तेरी बातों से।
साथ चाहूं मैं तेरा खुशनुमा लम्हों के लिये।
चल दिये छोड़ श़ज़र को वो अकेला घर मे।
शाख से अब जो उड़े,ऊँची उड़ानों के लिये।
आ गये दर पे तुम्हारे ही सवाली बनकर।
ढूँढते फिरते तुझे आज फरिश्तों की तरह।
आज देखी है कशिश यार तेरी आँखों मे।
*ऋतु पिये जाम ऩज़र से हिसाबो के लिये।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़



