मनोरंजन
ज़िद्दी बेल- प्रदीप सहारे

घर के आँगन में
दिखी एक छोटी
दो पत्तों की बेल।
धीरे-धीरे चढ़ने लगी,
दीवार से छत पर।
तो सुहानी लगी आँखों को।
फिर पतझड़ में पत्ते,
रात में कुछ कीड़े-मकोड़े
गिरने लगे आँगन में।
खटकने लगी आँखों में,
होने लगी चिड़चिड़।
काट दिया कुछ
जड़ के ऊपर से।
मुरझा गई कुछ,
धीरे-धीरे सूख गई।
मैं खुश हुआ।
कुछ दिनों बाद,
जड़ के ऊपर
दो-तीन पत्तियाँ
दिखने लगीं।
और फिर बहारने लगी
वह ज़िद्दी बेल।
धरती और जड़ से
जुड़ी हुई जो थी—
ज़िद्दी बेल।
— प्रदीप सहारे ,नागपुर, महाराष्ट्र




