मनोरंजन

पीड़ा एक नौकर की – डॉ जयप्रकाश तिवारी

 

नाम का भूखा नहीं हूँ मैं

धन का भूखा नहीं हूँ मैं

 

किन्तु कैसे मैं यह कह दूँ

कोठी में भूखा नहीं हूँ मैं?

 

प्रकृति की मार झेल रहा हूँ

तन पर आघात झेल रहा हूँ

मन को कब का मार चुका

पगड़ी सिर की उतार चुका

 

पड़ गए हाथ में, मोटे छाले

पाँव बने बिन पिए मतवाले

संगीत भी लगे बहुत रूखा

आखिर कब तक बैठूं भूखा?

 

मालिक कहे, अब घर को जा

थक गया है तू अब वापस जा

मत बोझ बनो, अब दर पर तू

अब घर को जा, घर को जा तू

 

चूस लिया जवानी अच्छी तरह

खेला जजबातों से अच्छी तरह

आज बतला दी उसने मुझको

मेरी औकात भी, अच्छी तरह

 

इस घर में जब मैं आया था

नादान-सा छोटा बालक था

जब बड़ा हुआ, आई समझ

उस घर में तब मैं चालक था

 

जिन्हें स्कूल छोड़ने जाता था

वे सब बड़े हुये साहब भी हुये,

बूढा मैं भाजी-सब्जी लाता था

इनके बच्चों को मैं टहलता था

 

आज जर्जर मेरा तन – मन है

अपना परिवार भी नहीं बसा

तय क्या थी, कितनी पगार?

यह अब तक मैंने नहीं जाना

 

खाना कपडा सब मिलता था

बातों का सुख भी मिलता था,

सोची न कभी अलगाव की बात

आई मन न कभी दुराव की बात.

 

अब मन में बहुत कुछ आता है

यह समय, बहुत ही चिढाता है,

तब कहता मैं, “छत है क्या”?

समझा आज “यह छत है क्या”?

– डॉ जयप्रकाश तिवारी भरसर, बलिया, उत्तर प्रदेश

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