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भाभी ने जो छुपाया (लघुकथा) – विजय कुमार शर्मा

utkarshexpress.com – रक्षाबंधन आने में बस कुछ ही दिन बाकी थे। शिवानी ने अपनी भाभी प्रिया भाभी को फोन किया और स्नेह से पूछा –
“भाभी, वो राखी जो भैया के लिए भेजी थी, मिल गई क्या?”
प्रिया भाभी ने एकदम सामान्य आवाज़ में जवाब दिया,
“नहीं दीदी, अभी तक तो नहीं मिली…”
शिवानी थोड़ी चिंतित हुई –
“कल तक देख लीजिए भाभी, अगर नहीं आई तो मैं खुद लेकर आ जाऊंगी। मेरे भैया की कलाई सूनी नहीं रहनी चाहिए!”
फोन कटने के बाद, प्रिया भाभी की मुस्कान गहरी हो गई।
असल में राखी दो दिन पहले ही आ चुकी थी। लेकिन उन्होंने किसी को बताया नहीं। एक योजना मन में पल रही थी।
अगली सुबह फिर से फोन किया –
“दीदी, अब तक राखी नहीं आई… क्या करें?”
शिवानी ने इस बार बिना देर किए अपने पति राजीव से कहा,
“गाड़ी निकालो, आज मुझे मायके जाना है… राखी बांधने!”
करीब 180 किलोमीटर की दूरी और 4 घंटे की यात्रा करके वो अपने मायके, कोटा पहुँच गई।
घर में भैया विक्रम, माँ सुधा जी, पापा शंकर लाल जी, और चुलबुली छोटी भतीजी आयुषी ने जैसे ही उसे देखा, घर में उत्सव का माहौल छा गया।
भैया की कलाई पर राखी बाँधी गई, मिठाइयाँ खिलाई गईं, और पूरे दिन ठहाकों व किस्सों की गूंज रही।
विदा की घड़ी आई, तो माँ ने बड़े ही स्नेह से टोका –
“अब तो तू आती ही नहीं, क्या ससुराल ही सबकुछ हो गया?”
शिवानी मुस्कराई –
“माँ, उधर भी तो एक माँ जैसी सासू माँ हैं… और इधर आपके पास प्रिया भाभी हैं, जो हर बार मेरा भी हिस्सा निभा लेती हैं।”
माँ ने धीरे से कहा –
“सच कहूँ, प्रिया बहुत समझदार बहू है। इस बार तेरी राखी दो दिन पहले ही आ गई थी, लेकिन उसने किसी को बताया नहीं। बस बार-बार कहती रही – दीदी को मायके बुलाना है… चार साल हो गए, दीदी हमारे साथ राखी नहीं मना पाईं।”
शिवानी की आँखें भर आईं।
वो दौड़कर प्रिया भाभी से लिपट गई –
“भाभी, आप इतना भी ख्याल मत रखा करो कि मुझे अपनी माँ के आँसू भी न दिखें…”
प्रिया की आँखों में भी नमी थी, पर चेहरे पर सुकून।
उस दिन एक ननद और भाभी के बीच राखी का एक नया रिश्ता बंधा – ऐसा जिसमें धागा तो पुराना था, पर प्रेम की गाँठें और भी मजबूत हो चुकी थीं। (विनायक फीचर्स)

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